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प्राइवेट नौकरी

Office Going Man
आज फिर शुरू हुआ एक नया दिन और हम निकल पड़े नौकरी करने। 

नौकरी ! जी हाँ नौकरी ! प्राइवेट नौकरी, 

जहां जाने का समय तो निश्चित है परंतु आने का नहीं। 

नौकरी की जदोजहद शुरू होती है, आपकी शिक्षा समाप्त होने पर,

पर कुछ लोग इससे पहले भी शुरू कर देते है, इस काम को मजबूरी वश।  

नौकरी का मतलब है – “हाँ जी की सरकार और न जी का घर” 

अन्य शब्दों मे कह सकते है -नौकरी मतलब 

नौ बजे आना, पर कब जाना पता नहीं । 

नौकरी कमाल है यदि बॉस जानकार और हंसमुख लाल है,

नौकरी बेहाल है यदि बॉस के आस-पास चमचों का जाल है। 

अपमान, तनाव और आलोचना का जैसे मेल है नौकरी,

अपनी आजादी पर स्वयं स्वीकृत का बंधन है नौकरी । 

नौकरी कहने को बेमिसाल है, हर महीने मिलता माल है,

पर लगती जी का जंजाल है, अगर काम का तरीका नहीं बेमिसाल है। 

कितना भी अच्छा काम करो, पर बॉस के मन मे रहता एक सवाल है, 

यह सही नहीं , वो ठीक नहीं, मुझे पता नहीं, दुबारा करके लाओ । 

इस तरह घड़ी की सुइयां भागती रहती है, और हम लगे रहते है काम की उधेड़-बुन मे 

सालभर बीत जाने पर कुछ उम्मीद होती है बोनस और वेतन वृद्धि की,

और खुश होता है मन देख तरक्की कंपनी की, इस बार तो कुछ अच्छा ही होगा। 


परंतु कौशल प्रदर्शन के चाबुक से उधेड़ दी जाती है, कर्मचारी की खुशी की चमड़ी,

चाह कर भी कुछ नहीं कर सकता वो, क्योंकि घिरा है कई जिम्मेदारियों से वो, 

सहर्ष स्वीकार कर लेता है जो प्राप्त हुआ और लग जाता है उम्मीद मे अगले साल की । 

नहीं जानता,  वो भी क्यों विवश है,  इस नौकरी को करने को। 

समझे । यही है -प्राइवेट नौकरी 

कृति -अनिल पाठक 


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