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एक पत्र की आत्मकथा

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 मै पत्र हूँ – पहचाना क्या ? पोस्टकार्ड  आज मैं  विलुप्त होने की कगार पर हूँ ?  कभी मेरी प्रसिद्धि होती थी, चहो ओर विचारों और संदेशों को पहुँचाने का माध्यम था- मैं ।  मैं कई  नामों से जाना जाता हूँ– जैसे चिट्ठी, पत्री, खत और पोस्टकार्ड आदि । वैसे तो मैं आज भी प्रचलित हूँ, परंतु आज के डिजिटल युग मे एसएमएस (SMS), चैट और ई-मेल ने मेरी जगह ले ली है ।  जहां आज मेरे डिजिटल बंधु प्रसिद्धि मे है, कभी मैं भी हुआ करता था? स्याही से लिखे संदेशों से अभिभूत, मैं अपना सफर एक शहर से एक गाँव, एक गाँव  से एक कस्बे और दूर-दराज के इलाकों तक डाक व्यवस्था के लाल और काले रंग के डिब्बों के जरिए  पोस्टमैन की मदद से तय करता था।     समय के साथ मेरे रूप मे भी कई परिवर्तन हुए। मैं अपने नए रूप मे ओर भी सुदृढ़ हुआ।  वैसे तो मैं संचार का सुगम साधन हूँ और विशेषतः दो प्रकार का होता हूँ -जैसे औपचारिक पत्र और अनौपचारिक पत्र । औपचारिक पत्र जो काम-काज की दुनिया मे इस्तेमाल होते है और अनौपचारिक पत्र जिन्हे आप व्यक्तिगत रूप से इस्तेमाल कर सकते हैं ।  भारत ...

किसी संगठन में पदनाम का महत्त्व

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  पदनाम हमारे जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मनुष्य ने कार्यस्थल पर विकास और कार्य के बेहतर प्रबंधन के लिए इस प्रणाली का विकास किया है। पदनाम  ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के अनुसार, पदनाम का अर्थ किसी व्यक्ति को उसके द्वारा किए जाने वाले काम या उसके पद के लिए दिया गया नाम है। हमने अपने व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन में पदनामों को विभिन्न नाम दिए हैं। यह पदानुक्रमित (एक ऐसी प्रणाली या संगठन जिसमें निम्नतम से उच्चतम तक कई स्तर होते हैं) या समानांतर प्रकृति का हो सकता है। निश्चित रूप से यह आपके सामान्य और सेवा जीवन के दौरान आपके विकास और अनुभव को दर्शाता है। पदनाम से नई जिम्मेदारी और अधिकार प्राप्त होते हैं। इससे नया आत्मविश्वास पैदा होता है और व्यक्ति को अपना काम ईमानदारी और निष्ठा के साथ करने की प्रेरणा मिलती है।  इसके अलावा, हमारी जीवन यात्रा भी इसी पदनाम पर आधारित होती है। हम नवजात शिशु से लेकर छोटे बच्चे तक, फिर युवा अवस्था तक और उसके बाद जीवन के अन्य चरणों की ओर बढ़ते हैं। इन पदनामों के कारण जीवन को अर्थ मिलता है और उन्नति के साथ-साथ हमें परिपक्वता और अनुभव प्राप्त होता ह...

खील-छोले वाला

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"खील-छोले वाला” मन अतीत के पन्ने पलट रहा था। अचानक एक आकृति सामने उभरी वो थी एक ऐसे शख्स की जो हमे हर दिन कुछ नया खिलाता था। यह मेरे अतीत का वह किरदार है जिसे हम सब बच्चे “खील-छोले वाला” कहकर बुलाते थे। वह एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति, हल्की सफेद दाढ़ी रखे , कुर्ता-लूँगी की साधारण सी वेशभूषा पहने, सिर पर कपड़े का साफा बाँधे और कंधे पर 30 से 40 किलो का बिसरी (जिसे बहँगी भी कहते है) का बोझा उठाए, गली-गली फेरी लगाया करता था। वह बेचता था, चटपटी दाल, चने, मुरमुरे, तली हुई मूंगफली, सादा सेव वाली नमकीन, चटपटे लाल-मिर्च वाली आलू की चिप्स, मीठी खील, गुड़ के सेव, तिल और मूंगफली की पट्टी आदि अन्य प्रकार की नमकीन और मीठी वस्तुए, जो बच्चों को अधिक प्रिय होती थी।  हम सब बच्चे बेसब्री से उसका इंतजार किया करते थे, जब वो आवाज लगता था “खीलछोले वाला”। वो हमे हमारी पसंद की खाने की वस्तु कोननुमा पुड़िया बांधकर देता था। फेरी वाला होने के बावजूद वो कभी भी घटिया प्रकार का सामान नहीं बेचता था। छोटे-बड़े सभी प्रकार के बच्चों को उनकी पसंदीदा चीज देकर खुश करता था। उस समय एक पुड़िया की कीमत 25 से 50 पैसे के करीब रही होग...

वर्षा ऋतु

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वर्षा ऋतु  धरती भीग रही है जल से  गगन आच्छादित है मेघों से रिमझिम रिमझिम मेघ बरसते धरती की अग्नि को हरते पेड़-पौधे है खूब लहलाते   चारों और हरियाली फैलाते  भीनी-भीनी मिट्टी की खुशबू  फैल रही है चारों ओर बूंदों की टप-टप की आहट  पैदा करती संगीत बेजोड़  नदिया उफनी तालाब भर गए  मेढक करते टर्र-टर्र का शोर  बूंदों की झालर से लदी डालिया सहर्ष सहती है उनका बोझ  कैसी कड़क रही है बिजली  जैसे प्रकृति बजा रही है ढोल  प्रकृति ने करवट है बदली  वर्षा ऋतु का है यह शोर  प्रकृति निखरी गगन साफ है  इन्द्रधनुष भी नभ मे आज है  प्रकृति का सौन्दर्य कर रहा  आज हमें भाव-विभोर  प्रकृति ने करवट है बदली  वर्षा ऋतु का है यह दौर।  कृति : अनिल पाठक 

प्राइवेट नौकरी

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आज फिर शुरू हुआ एक नया दिन और हम निकल पड़े नौकरी करने।  नौकरी ! जी हाँ नौकरी ! प्राइवेट नौकरी,  जहां जाने का समय तो निश्चित है परंतु आने का नहीं।  नौकरी की जदोजहद शुरू होती है, आपकी शिक्षा समाप्त होने पर, पर कुछ लोग इससे पहले भी शुरू कर देते है, इस काम को मजबूरी वश।   नौकरी का मतलब है – “हाँ जी की सरकार और न जी का घर”  अन्य शब्दों मे कह सकते है -नौकरी मतलब  नौ बजे आना, पर कब जाना पता नहीं ।  नौकरी कमाल है यदि बॉस जानकार और हंसमुख लाल है, नौकरी बेहाल है यदि बॉस के आस-पास चमचों का जाल है।  अपमान, तनाव और आलोचना का जैसे मेल है नौकरी, अपनी आजादी पर स्वयं स्वीकृत का बंधन है नौकरी ।  नौकरी कहने को बेमिसाल है, हर महीने मिलता माल है, पर लगती जी का जंजाल है, अगर काम का तरीका नहीं बेमिसाल है।  कितना भी अच्छा काम करो, पर बॉस के मन मे रहता एक सवाल है,  यह सही नहीं , वो ठीक नहीं, मुझे पता नहीं, दुबारा करके लाओ ।  इस तरह घड़ी की सुइयां भागती रहती है, और हम लगे रहते है काम की उधेड़-बुन मे  सालभर बीत जाने पर कुछ उम्मीद होती है बोनस और व...

गालियाँ या अपशब्द

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गाली किसी भाषा की बोली मे प्रयुक्त, क्रोध वश उचारित कुछ विशेष शब्द है, जो झगड़े के आरंभ मे दो बुद्धि जीव, एक दूसरे के साथ साझा करते है।  यह कुछ अटपटे-बेढंगे और त्वरित उत्पन्न शब्द भी हो सकते है,  इनका किसी झगड़े और विवाद मे मूल स्थान होता है।  क्रोध को व्यक्त करने का एक बहुत ही सरल और सहज साधन है-गाली,  गाली-जो कभी-कभी लहू-लुहान कर देती है आपके चरित्र और मन को, कौन है ऐसे शब्दों का रचीयता, जो बिना हथियार ही घायल कर देता है, तन और मन को।  जिसका श्रवण मात्र ही भर देता है,  मन को भीषण क्रोध और आत्मग्लानि से , भड़का देती है प्रतिशोध की ज्वाला मन मे और उच्चारित होती है गालियाँ प्रतियुतर मे ।  गाली जो एक सरल और सीधे मानव को भी भर लेती है अपने आगोश मे, और वह भी शुरू कर देता है उन अटपटे-बेढंगे और त्वरित उत्पन्न शब्द का सैलाब ।  कभी-कभी भयंकर परिणाम का कारण भी बन जाती हैं ये गालियां, जब की कही-कही सरल सीधे स्वभाव से, दैनिक जीवन का हिस्सा है गालियां ।  अक्सर गाली का प्रयोग अपमानजनक, निन्दात्मक या कठोर भाषा के रूप में ही होता है। अंग्रेजी  में इसे "sw...