वर्षा ऋतु
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| वर्षा ऋतु |
गगन आच्छादित है मेघों से
रिमझिम रिमझिम मेघ बरसते
धरती की अग्नि को हरते
पेड़-पौधे है खूब लहलाते
चारों और हरियाली फैलाते
भीनी-भीनी मिट्टी की खुशबू
फैल रही है चारों ओर
बूंदों की टप-टप की आहट
पैदा करती संगीत बेजोड़
नदिया उफनी तालाब भर गए
मेढक करते टर्र-टर्र का शोर
बूंदों की झालर से लदी डालिया
सहर्ष सहती है उनका बोझ
कैसी कड़क रही है बिजली
जैसे प्रकृति बजा रही है ढोल
प्रकृति ने करवट है बदली
वर्षा ऋतु का है यह शोर
प्रकृति निखरी गगन साफ है
इन्द्रधनुष भी नभ मे आज है
प्रकृति का सौन्दर्य कर रहा
आज हमें भाव-विभोर
प्रकृति ने करवट है बदली
वर्षा ऋतु का है यह दौर।

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