खील-छोले वाला
"खील-छोले वाला” मन अतीत के पन्ने पलट रहा था। अचानक एक आकृति सामने उभरी वो थी एक ऐसे शख्स की जो हमे हर दिन कुछ नया खिलाता था। यह मेरे अतीत का वह किरदार है जिसे हम सब बच्चे “खील-छोले वाला” कहकर बुलाते थे। वह एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति, हल्की सफेद दाढ़ी रखे , कुर्ता-लूँगी की साधारण सी वेशभूषा पहने, सिर पर कपड़े का साफा बाँधे और कंधे पर 30 से 40 किलो का बिसरी (जिसे बहँगी भी कहते है) का बोझा उठाए, गली-गली फेरी लगाया करता था। वह बेचता था, चटपटी दाल, चने, मुरमुरे, तली हुई मूंगफली, सादा सेव वाली नमकीन, चटपटे लाल-मिर्च वाली आलू की चिप्स, मीठी खील, गुड़ के सेव, तिल और मूंगफली की पट्टी आदि अन्य प्रकार की नमकीन और मीठी वस्तुए, जो बच्चों को अधिक प्रिय होती थी। हम सब बच्चे बेसब्री से उसका इंतजार किया करते थे, जब वो आवाज लगता था “खीलछोले वाला”। वो हमे हमारी पसंद की खाने की वस्तु कोननुमा पुड़िया बांधकर देता था। फेरी वाला होने के बावजूद वो कभी भी घटिया प्रकार का सामान नहीं बेचता था। छोटे-बड़े सभी प्रकार के बच्चों को उनकी पसंदीदा चीज देकर खुश करता था। उस समय एक पुड़िया की कीमत 25 से 50 पैसे के करीब रही होग...