खील-छोले वाला

"खील-छोले वाला”
मन अतीत के पन्ने पलट रहा था। अचानक एक आकृति सामने उभरी वो थी एक ऐसे शख्स की जो हमे हर दिन कुछ नया खिलाता था। यह मेरे अतीत का वह किरदार है जिसे हम सब बच्चे “खील-छोले वाला” कहकर बुलाते थे।
वह एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति, हल्की सफेद दाढ़ी रखे , कुर्ता-लूँगी की साधारण सी वेशभूषा पहने, सिर पर कपड़े का साफा बाँधे और कंधे पर 30 से 40 किलो का बिसरी (जिसे बहँगी भी कहते है) का बोझा उठाए, गली-गली फेरी लगाया करता था। वह बेचता था, चटपटी दाल, चने, मुरमुरे, तली हुई मूंगफली, सादा सेव वाली नमकीन, चटपटे लाल-मिर्च वाली आलू की चिप्स, मीठी खील, गुड़ के सेव, तिल और मूंगफली की पट्टी आदि अन्य प्रकार की नमकीन और मीठी वस्तुए, जो बच्चों को अधिक प्रिय होती थी।
हम सब बच्चे बेसब्री से उसका इंतजार किया करते थे, जब वो आवाज लगता था “खीलछोले वाला”। वो हमे हमारी पसंद की खाने की वस्तु कोननुमा पुड़िया बांधकर देता था। फेरी वाला होने के बावजूद वो कभी भी घटिया प्रकार का सामान नहीं बेचता था। छोटे-बड़े सभी प्रकार के बच्चों को उनकी पसंदीदा चीज देकर खुश करता था। उस समय एक पुड़िया की कीमत 25 से 50 पैसे के करीब रही होगी। हमे प्रतिदिन स्कूल से लौटने के बाद वो पुड़िया खाने को मिलती थी। हरदिन हमारी पसंद के अनुसार पुड़िया मे खाने का सामान होता था। हमारी पुड़िया मे होता था, चने की दाल और नमकीन सेव, चने और मीठी खील, बेसन की पापड़ी, गुड़ व तिल की पट्टी या चौलाई व मुरमुरे के लड्डू । हम स्कूल से आने के बाद उस पुड़िया को लेकर बहुत खुश हो जाया करते थे। बहुत ही मजेदार थे, बचपन के वोह दिन और खील-छोले वाला।
उस दौर मे आज की तरह चिप्स और नमकीन के पैकेट का चलन नहीं था, और यह एक अच्छा स्नैक्स का विकल्प था। खील-छोले वाले को मोहल्ले के सभी बच्चों की पसंद व नपसंद का पता था। वो किसी भी बच्चे को अधिक मिर्च-मसाले वाली नमकीन देने से मना कर देता था। हम रविवार और छुट्टी के दिन उसका बेसब्री से इंतजार करते थे, जिससे अपनी मर्जी की चीज ले सके। यद्यपि परिवार का भरण-पोषण करने के लिए सभी प्रकार का समान बेचना जरूरी था। परंतु वह ऐसी कोई भी वस्तु जो छोटे बच्चों को किसी भी प्रकार से हानि पहुँचा सकती थी, नहीं देता था।
कभी-कभी स्कूल के बहार वो देखाई दे जाता था और उसकी निगाह हम पर पड़ती थी, तो वो हमारी मनपसंद चीज हमे वही दे देता था और कहता था पैसे घर से ले लूँगा। बहुत मेहनती और कर्मठ इंसान था, -खील-छोले वाला। उसकी वो आवाज “खील-छोले ले लो” आज भी कानों मे गुंजाय मान है।
आज जहां इंसान अपने जरा से फायदे के लिए किसी को किसी हद तक जाकर नुक्सान पहुँचा सकता है वो खील-छोले वाला अपनी दुकानदारी की खातिर कभी किसी बच्चे को गलत वस्तु नहीं देता था, चाहे वह बच्चा स्वयं ही चीज लेने क्यों ना आया हो।
ईमानदारी, मेहनत और विश्वास का प्रतीक वो खील-छोले वाला आज भी मेरी यादों मे जिंदा है। कुछ लोग आपकी स्मृति पर गहरी छाप छोड़ जाते है, उनमे से ही एक था, खील-छोले वाला, जिसका असली नाम कभी हम बच्चों को पता ही नहीं था, हम तो सिर्फ उस खील-छोले वाले कहकर संबोधित करते थे ।
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