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एक पत्र की आत्मकथा

 मै पत्र हूँ – पहचाना क्या ?

पोस्टकार्ड
पोस्टकार्ड 
आज मैं  विलुप्त होने की कगार पर हूँ ? 

कभी मेरी प्रसिद्धि होती थी, चहो ओर विचारों और संदेशों को पहुँचाने का माध्यम था- मैं । 

मैं कई  नामों से जाना जाता हूँ– जैसे चिट्ठी, पत्री, खत और पोस्टकार्ड आदि । वैसे तो मैं आज भी प्रचलित हूँ, परंतु आज के डिजिटल युग मे एसएमएस (SMS), चैट और ई-मेल ने मेरी जगह ले ली है । 

जहां आज मेरे डिजिटल बंधु प्रसिद्धि मे है, कभी मैं भी हुआ करता था? स्याही से लिखे संदेशों से अभिभूत, मैं अपना सफर एक शहर से एक गाँव, एक गाँव  से एक कस्बे और दूर-दराज के इलाकों तक डाक व्यवस्था के लाल और काले रंग के डिब्बों के जरिए  पोस्टमैन की मदद से तय करता था।    

समय के साथ मेरे रूप मे भी कई परिवर्तन हुए। मैं अपने नए रूप मे ओर भी सुदृढ़ हुआ। 

वैसे तो मैं संचार का सुगम साधन हूँ और विशेषतः दो प्रकार का होता हूँ -जैसे औपचारिक पत्र और अनौपचारिक पत्र । औपचारिक पत्र जो काम-काज की दुनिया मे इस्तेमाल होते है और अनौपचारिक पत्र जिन्हे आप व्यक्तिगत रूप से इस्तेमाल कर सकते हैं । 

भारत मे पोस्ट सर्विस की शुरुआत अग्रेजों द्वारा की गई थी। उन्ही के द्वारा भारत में पहला पोस्टकार्ड वर्ष 1879 में जारी किया गया था। यह मेरा अत्यधिक प्रचलित रूप था जिसने दशकों तक लोगों के बीच उनके परिचितों और परिजनों का सुख-दुख संदेश के माध्यम से पहुंचाया। मेरा यह स्वरूप सबसे सस्ता पर गोपनीय नहीं था। 

पोस्टकार्ड के बाद भारत में संदेश भेजने का मुख्य साधन अंतर्देशीय पत्र (Inland Letter Card) बना । यह पोस्टकार्ड से अलग था क्योंकि इसमें संदेश खुला नहीं रहता था, बल्कि कागज को मोड़कर गोंद से चिपकाया जाता था। इसे खोलने पर ही अंदर लिखा संदेश पढ़ा जा सकता था, जिससे गोपनीयता बनी रहती थी। मेरे इस रूप की शुरुआत भारत मे  2 अक्टूबर 1950 को हुई थी । मेरे ये दोनों रूप शुल्क आधारित थे पर दोनों ही लोगों के बीच संदेशों का आदान -प्रदान करने के मुख्य साधन थे । 


चिट्ठी
चिट्ठी 

इन दो रूपों के अलावा मेरा लिफाफे वाला रूप भी काफी प्रचलित हुआ। चिट्ठी का लिफाफे वाला रूप पारंपरिक पत्र-व्यवहार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसमें लिखित संदेश को सुरक्षित रखने और सही पते पर पहुंचाने के लिए एक कागजी आवरण (लिफाफे) का उपयोग किया जाता है। इसमें भेजने वाले और पाने वाले दोनों का विवरण, डाक टिकट और सही पता दर्ज होता है। मेरा यह रूप राखी भेजने का एकमात्र साधन था, जो आज भी चलन मे है। 

मैं लोगों के अपनों तक उनकी व्यक्तिगत बातों को सरलता और अपनेपन से पहुँचाने का साधन हूँ, परंतु आज SMS, वीडियो कॉल, ई-मेल और चैट जैसे आधुनिक सुविधाओं ने मेरे को पीछे छोड़ दिया है।

लोगों की अपनी लिखावट मे लिखा मै (खत) अपनों के बीच एक अजीब से बंधन का प्रतीक था । आज तो लोग शायद लिखना भूल ही गए है, शायद ही कोई होगा जो अपनी लिखावट मे कुछ लिखता हो। पहले इतना कठिन समय बिताने के बाद भी (पत्र पेटी मे बंद रहना फिर एक पोस्ट ऑफिस से दूसरे पोस्ट ऑफिस, फिर जाकर गंतव्य तक पहुंचना) इतना बुरा नहीं लगता था, परंतु आज महीनों-महीनों अलमारी मे पड़े रहना उबाऊ लगता है क्योंकि कोई खरीदार नहीं है- पर क्या करे आज दौर बदल गया है। 

यादों के सहारे जीता मैं पत्र।   



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